हाँ अपने अपराध मुझे स्वीकार्य सभी ,

ऐसा दण्ड दो हो पापों का क्षय जिससे ॥

सुख के कारागार से कर दो मुक्त मुझे ।

लौह-श्रंखला भार से कर दो युक्त मुझे ।

नख उखाड़ो, कीलें ठोंको, दागो, पीटो

और हँसो भीषण पीड़ा दे उक्त मुझे ।

ताकि करूँ ना फिर से ऐसा कार्य कभी ,

हो स्वतन्त्रता छिन जाने का भय जिससे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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