मुक्तक : 676 – आती हो बिन झझक क्यों ?

चुप-चाप नाँह कंगन-पायल बजा-बजा के ॥ आती हो बिन झझक क्यों ? आती नहीं लजा के ॥ क्या चाहती हो मुझसे ? क्यों बार-बार मेरे – एकांत में स्वयं को लाती हो तुम सजा के ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 675 – न दिल अब निगोड़ा

न दिल अब निगोड़ा यहाँ लग रहा है ॥ न इतना भी थोड़ा वहाँ लग रहा है ॥ चले क्या गए ज़िंदगी से वो मेरी – मुझे सूना-सूना जहाँ लग रहा है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 674 – तेरे जलवों की

नहीं मेरे अकेले की ये लाखों की हजारों की ॥ तेरे जलवों की तेरे दीद की तेरे नज़ारों की ॥ बख़ूबी जानते हैं तू कभी आया न आएगा , सभी को है मगर आदत सी तेरे इंतज़ारों की ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 673 – सरे बज़्म मेरी बाहों में

सरे बज़्म मेरी बाहों में आकर के झूम ले ॥ तनहाई में पकड़ के मेरा हाथ घूम ले ॥ बेशक़ ! बशौक़ दे-दे तू फिर मौत की सज़ा , सिर्फ़ एक बार मुझको तहेदिल से चूम ले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

गीत (28) – आग को पानी कब तक कहलवाओगे ?

पथ में पाटल नहीं ॥  पग में चप्पल नहीं ॥  मुझको काँटों पे कब तक यों दौड़ाओगे ? चाहे जल ना सके पर जलाता रहा ।   आग से आग जल में लगाता रहा ।  तुमने जो-जो भी चाहा वो करता...Read more

मुक्तक : 672 – आँखों में मेरी अश्क़ का

आँखों में मेरी अश्क़ का दरिया भरा रहा ॥ ग़म का बग़ीचा दिल का हमेशा हरा रहा ॥ चाहा तो ज़िंदगी को था हँसकर गुजारना , पर जब तलक जिया मैं मरा ही मरा रहा ॥ -डॉ हीरालाल प्रजापति Read more