सत्य कहता हूँ उठाकर प्राणप्रिय की मैं शपथ –

ठेस यदि मन को लगी मेरी मरन हो जाएगी ॥

पीट लो जी चाहे जितना चर्म-कोड़ों से ।

फोड़ दो सर मोटे डंडों से या रोड़ो से ।

ऊँचे-ऊँचे पर्वतों से मुझको फिंकवा दो ,

रौंदवा दो बैलगाड़ी अथवा घोड़ों से ।

मेरे तन की वज्रता की देखलो करके परख –

मुझको कायागत हर इक पीड़ा सहन हो जाएगी ॥

तुझको हँसता देख होता हूँ सुखी मन में ।

तुझको रोता पाऊँ तो होता दुखी मन में ।

मैं हँसा करता सदा तुझको हँसाने को ,

कस-दबाकर कष्ट के ज्वालामुखी मन में ।

मुझको ठुकरा दे न होगा कोई पछतावा न दुख –

और को अपनाएगी तो फिर जलन हो जाएगी ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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