भूल विदूषक की भी हँसकर ,

मित्र उड़ाओ मत तुम खिल्ली ॥

सोची-समझी , देखी-परखी ।

मैंने तब जाकर है रक्खी ।

काली ,काली नागिन जैसी –

चूहे की रक्षा को बिल्ली ॥

तेरा तुझको श्याम श्वेत है ।

मेरा गमला मुझे खेत है ।

तुझको तेरी चींटी बिच्छू –

मुझको साँप है मेरी इल्ली ॥

माना तेरा नगर नियारा ।

मुझको मेरा गाँव पियारा ।

तेरी दिल्ली तो दिल्ली है –

मुझको मेरा लखनऊ दिल्ली ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *