सुख-दुख सारे डूब-उतरकर ,

सब मन ही मन सहते थे ॥

प्रेम-बाढ़ में हंस-बतख से ,

दोनों सँग-सँग बहते थे ॥

मोबाइल का दौर नहीं था ।

मिलने का भी ठौर नहीं था ।

दिल की बातों को कहने का –

चारा कोई और नहीं था ।

इक-दूजे को चिट्ठी पर

चिट्ठी भर लिखते रहते थे ॥

ध्वनि का कोई काम नहीं था ।

जिह्वा का तो नाम नहीं था ।

भावों का सम्पूर्ण प्रकाशन –

गुपचुप था कोहराम नहीं था ।

आँखों के संकेतों से सब

अपने मन की कहते थे ॥

मिलते थे पर निकट न आते ।

वृक्ष-लता से लिपट न जाते ।

यदि पकड़े जाते तो सोचो –

जग से दण्ड विकट न पाते ?

इक-दूजे को दृष्टिकरों से

बिन छूकर ही गहते थे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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