माना है आज प्रेम – दिवस तो मैं क्या करूँ ?

करता नहीं है कोई मुझसे प्यार अभी तक ।

मैं भी नहीं किसी का तलबगार अभी तक ।

ना मैं किसी का रास्ता देखूँ नज़र बिछा –

ना है किसी को मेरा इंतज़ार अभी तक ।

फिर किसलिए मनाऊँ जश्न नाचता फिरूँ ?

ना आए उसका इंतज़ार मेरी नज़र में ।

नादानी है इक तरफ़ा प्यार मेरी नज़र में ।

जिसका न अपना होना तय हैउसके वास्ते –

दिन-रात रहनाबेक़रार मेरी नज़र में ।

कोई मुझपे जब मरे नमैं भी उसपे क्यों मरूँ ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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