तेरी पाकीज़ा मोहब्बत का मेरे –

पास हरदम ख़ास ताज-ओ-तख़्त था ॥

मरके भी करता रहा मुझको मोहब्बत बेपनाह ।

आग में जलते हुए भरता रहा तू सर्द आह ।

जानता था जबकि तू कुछ भी कहे बिन मर गया –

तुझको मेरी ही ज़रूरत, तुझको थी मेरी ही चाह ।

कुछ मेरी गफ़लत थी कुछ मेरा गुनह –

तुझको मैं ना पा सका कमबख़्त था ॥

जबकि कहने के लिए घुटता रहा दिन और रात ।

चाहकर भी कह न पाया था तू अपने दिल की बात ।

तू सुनाने के लिए बेचैन रहता था मगर –

मैंने कहने का तुझे मौक़ा दिया कब ताहयात ?

जाने क्यों लेकिन हक़ीक़त में तेरे –

साथ में मेरा रवैया सख़्त था ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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