बेशक़ ! यह लगता अजीब है ॥

वह करता है अपने मन की ।

कुछ कहते हैं उसको सनकी ,

कुछ उसको धुर सिड़ी पुकारें –

वह मेरे दिल के क़रीब है ॥

नज़्म रईसाना सब उसकी ।

ग़ज़ल अमीराना सब उसकी ।

वह अदीब लिखता दौलत पर –

मगर निहायत ही ग़रीब है ॥

सारे ही हथियार पकड़ता ।

जान हथेली पर ले लड़ता ।

लेकिन जीत कभी ना पाता –

दुश्मन जो उसका नसीब है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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