आँखों में मेरी अश्क़ का दरिया भरा रहा ॥

ग़म का बग़ीचा दिल का हमेशा हरा रहा ॥

चाहा तो ज़िंदगी को था हँसकर गुजारना ,

पर जब तलक जिया मैं मरा ही मरा रहा ॥

-डॉ हीरालाल प्रजापति 

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