पथ में पाटल नहीं ॥ 

पग में चप्पल नहीं ॥ 

मुझको काँटों पे कब तक यों दौड़ाओगे ?

चाहे जल ना सके पर जलाता रहा ।  

आग से आग जल में लगाता रहा । 

तुमने जो-जो भी चाहा वो करता रहा ।

मैं कुओं से मरुस्थल को भरता रहा ।

यों मैं निर्बल नहीं ॥ 

पर कोई कल नहीं ॥ 

क्या न जीवित पे थोड़ा तरस खाओगे ?

कंटकित हार को पुष्पमाला कहा ।

तेरे कहने पे तम को उजाला कहा ।

झूठ का बोझ अब मुझको यों लग रहा –

जैसे हिरनी को चट करने सिंह भग रहा ।

बूंद भर जल नहीं ॥ 

फिर भी मरुथल नहीं ॥ 

आग को पानी कब तक कहलवाओगे ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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