नहीं मेरे अकेले की ये लाखों की हजारों की ॥

तेरे जलवों की तेरे दीद की तेरे नज़ारों की ॥

बख़ूबी जानते हैं तू कभी आया न आएगा ,

सभी को है मगर आदत सी तेरे इंतज़ारों की ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *