मुक्तक : 686 – और नहीं कुछ प्राण था वो

उसको विपल भर विस्मृत करना संभव नहीं हुआ ॥ प्रतिक्षण हृद ही हृद रोने से टुक रव नहीं हुआ ॥ और नहीं कुछ प्राण था वो पर उस बिन मैं ; सोचना , होगी मेरी क्या लौह-विवशता जो शव नहीं हुआ ? [ विपल = पल का साठवाँ भाग...Read more

गीत : फिर आज याद मुलाक़ात की वो रात आई

फिर आज याद मुलाक़ात की वो रात आई ॥ लिए हथेली पे क्यूँ मौत ख़ुद हयात आई ? गुजर गए के लिए अगर मैं बस रोऊँ । कि वक़्त ऐसे तो मैं और-और भी खोऊँ । बिसार कर बीती सुध अब...Read more

मुक्तक : 685 – इक अहा सौ

इक अहा सौ आहों के भरने के बाद ।। हिम सी यदि ठंडक मिले जरने के बाद ।। ऐसी आहा ऐसी शीतलता है ऐसी , फिर से ज्यों जी जाए जिव मरने के बाद ।। [ जरने=जलना ,जिव=जीव ] -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 684 – सच न केवल

सच न केवल दृगपटल में ही अवस्थित है ॥ अपितु मन के तल में भी अब वह प्रतिष्ठित है ॥ उसकी ही संप्राप्ति अंतिम ध्येय जीवन का – दूसरा कोई न मेरा लक्ष्य निश्चित है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

गीत : 36 – जीवन – चाय

  बहुत बेस्वाद , केवल गर्म पानी और अति फीकी ॥ लगा होंठ अपने मेरी कर दो जीवन-चाय तुम मीठी ॥ रहे तुम भी अछूते औ’ हृदय मेरा रहा रीता । समय दोनों का जो एकांत के सान्निध्य में बीता । कि अब...Read more

गीत (34) – सब कुछ वो मुझसे छीन

सब कुछ वो मुझसे छीन-झपट आज ले गया ॥ हिलमिल के रहते थे जो मेरे संग प्यार से । पाले थे मैंने जितने भी विहंग प्यार से । पिक,काक,शुक,कपोत और बाज ले गया ॥ दो-चार-पाँच-छः या कदाचित् वो सात थे...Read more