उसके साथ खेलकर होली आज तृप्त मन को करना है ॥

जिसको बिन पूछे मैं अपना श्वेत-धवल मन दे बैठा ।

और रँगा इतना उसके रँग इंद्रधनुष ही बन बैठा ।

अपने सप्त रँगों से उसके वर्ण-सिक्त मन को करना है ॥

मैं उसमें ऐसा ही फैलूँ जैसी वह मुझमें व्यापे ।

या मैं उसको कर दूँ विस्मृत या वह भी मुझको जापे ।

भूल एक पक्षीय कभी ना प्रेम-क्षिप्त मन को करना है ॥

जिसकी याद हृदय में सावन-जेठ हरी ही रहती है ।

नीले सागर सी जो मन में सदा भरी ही रहती है ।

बूँद-बूँद उसकी उलीचकर पूर्ण-रिक्त मन को करना है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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