पेड़ हरा औ’ भरा भी सूखी डाली सा लगता ॥

इक तू न हो तो सारा मेला खाली सा लगता ॥

तू जो चले सँग तो काँटों की चुभन भली लगती ।

तू जो साथ खाए तो नीम मिसरी की डली लगती ।

तुझ बिन अपनी ईद मुहर्रम जैसी होती है –

तू हो तो होलिका-दहन दीवाली सा लगता ॥

झर-झर बहती रहतीं , रहतीं तनिक नहीं सूखी ।

जब तेरे दर्शन को अँखियाँ हो जातीं भूखी ।

मुझको थाल सुनहरा लगने लगता है सूरज –

चाँद चमकती चाँदी वाली थाली सा लगता ॥

केवल क़द-काठी तक मेरा हृदय आँकते हो ।

रहन-सहन पहनावा भी तुम व्यर्थ झाँकते हो ।

मेरे तल तक पहुँचो फिर गहराई बतलाना –

नील-गगन से नद भी उथली नाली सा लगता ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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