इतनी तो मसर्रत दे ।।

अब ग़म न दे , शामत दे ।।1।।

बिक जाऊँगा मैं भी गर ,

मुँहमाँगी जो क़ीमत दे ।।2।।

सब क़र्ज़ चुका दूँगा ,

दो रोज़ की मोहलत दे ।।3।।

होने को तरोताज़ा ,

आराम की फ़ुर्सत दे ।।4।।

बोझ अपना सकूँ ढो ख़ुद ,

रब इतनी तो ताक़त दे ।।5।।

नफ़्रत तो न दे चाहे ,

मत मुझको मोहब्बत दे ।।6।।

मत जिस्म अकेले को ,

दिल को भी नज़ाकत दे ।।7।।

मत सिर्फ़ अमीरों को ,

ग़ुरबा को भी दौलत दे ।।8।।

गुमनाम को मशहूरी ,

बदनाम को शुह्रत दे ।।9।।

कुछ शौक़ दे जीने को ,

कुछ ख़्वाब या हसरत दे ।।10।।

जीने की न दे तो फिर ,

मरने की इजाज़त दे ।।11।।

(मसर्रत =ख़ुशी ,शामत =मृत्यु ,ग़ुरबा =ग़रीबों )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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