जो भी है मुझमें मिट्टी तुम आज उसको छूकर ,

आँखों को चौंधियाता कर दो विशुद्ध सोना ॥

जो मुझमें ऊगकर यों भरपूर लहलहाए ।

जल भी न दूँ मैं फिर भी प्यासों से मर न जाए ।

कुछ इस तरह से मेरे बंजर में हल चलाओ

पढ़-पढ़ के मंत्र मुझमें जादू के बीज बोना ॥

बिन झिझके बिन विचारे होकर निःशंक मुझ पर ।

लोगों ने छाप डाले झूठे कलंक मुझ पर ।

तुम मेरी गंगा-जमुना तुम मेरा आबे ज़मज़म

घिस-घिस , रगड़-रगड़ के मुझको नहाना-धोना ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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