बहुत बेस्वाद , केवल गर्म पानी और अति फीकी ॥

लगा होंठ अपने मेरी कर दो जीवन-चाय तुम मीठी ॥

रहे तुम भी अछूते औ’ हृदय मेरा रहा रीता ।

समय दोनों का जो एकांत के सान्निध्य में बीता ।

कि अब जब आ गए मेले में तो मेरे निवेदन की –

करो स्वीकार पहली और अंतिम प्रेम की चीठी ॥

पहाड़ों से खड़े पैरों को गति औ’ लास्य मिल जाए ।

निरंतर चुप पड़े होठों को स्वर औ’ हास्य मिल जाए ।

तुम्हारे हाथ में है , हाथ मेरा थाम लो यदि तुम –

कि मुझ अंधे को मिल जाएगा कोई लक्ष्य या वीथी ॥

( चीठी=पत्र , लास्य=नृत्य ,वीथी=मार्ग )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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