फिर आज याद मुलाक़ात की वो रात आई ॥

लिए हथेली पे क्यूँ मौत ख़ुद हयात आई ?

गुजर गए के लिए अगर मैं बस रोऊँ ।

कि वक़्त ऐसे तो मैं और-और भी खोऊँ ।

बिसार कर बीती सुध अब लूँ आगे की ,

चली गई जो घड़ी वो किसके हाथ आई ?

कहीं भी रोक लो मुमकिन हो तो दिल आने को ।

ये खूबरुई तो है बस हमें बनाने को ।

बनाए चेहरों को मासूम संगदिल फिरते ,

समझ इक उम्र के बाद हमें ये बात आई ॥

जिये कोई कि मरे नहीं हमारा ग़म ।

वो माना है दुश्मन पड़ौसी है ताहम ।

ख़मोश कैसे रहें कहाँ से लाएँ सबिर ?

यहाँ पे मातम है वहाँ बरात आई ॥

कि उनके आगे हमें हमेशा झुकना पड़ा ।

वो जब चले तो चले रुके तो रुकना पड़ा ।

लगाई हमने कभी जो भूले शर्त कोई ,

वो जीते अपने तो हाथों में सिर्फ़ मात आई ॥

( हयात=जीवन / खूबरुई=सुंदरता / संगदिल=पाषाण-हृदय / ताहम=फिर भी / ख़मोश=चुप / सबिर=धैर्य )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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