मुक्तक : 705 – ग़म बड़े मिले ॥

बैठे कहीं , कहीं – कहीं खड़े-खड़े मिले ॥ कुछ ख़ुद ख़रीदे कुछ नसीब में जड़े मिले ॥ तिल-राई ज़िंदगी में ताड़ औ’ पहाड़ से , हँस-रो के ढोने दिल के सर को ग़म बड़े मिले ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 704 – सचमुच आरामदेह है

नर्म गद्दे पे छाई नर्म रेशमी चद्दर ।। सचमुच आरामदेह है बहुत मेरा बिस्तर ।। चूर थककर हूँ नींद भी भरी है आँखों में , फिर सबब क्या है जो मैं बदलूँ करवटें शब भर ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 703 ( B ) – तन-मन में भर दे आग

अधि ,अद्वितीय ,अति अतुल्य ,अरु अनूप से ॥ तन-मन में भर दे आग ऐसे त्रिय-स्वरूप से ॥ स्वस्तित्व को बचाने बर्फ़-ब्रह्मचारियों , बचना सदैव जलती-चिलचिलाती धूप से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 703 – ऐश-ओ-आराम की

ऐश-ओ-आराम की हसरत अज़ाब से पूरी ।। आब-ए-ज़मज़म की ज़रूरत शराब से पूरी ।। क्या बताएँ रे तुझे कैसे-कैसे की हमने ? बारहा तेरी तलब सिर्फ़ ख़्वाब से पूरी !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

162 : ग़ज़ल – आईना पारा वाला

आईना पारा वाला बंदर का देख ।। हैराँ हूँ शीशे का घर पत्थर का देख ।।1।। बाहर से वह लगती गंगा-जमुना ठीक , छी ! उसको पाया नाली अंदर का देख ।।2।। इतना अलसाया था जा लेटा फ़िलफ़ौर , कुछ...Read more

मुक्तक : 702 ( ( B ) – ये पचहत्तरवाँ साल है ॥

वज़्नी ज़ईफ़ी में भी जवाँ ये मलाल है ॥ उनसे जुदाई का ये पचहत्तरवाँ साल है ॥ इस सिन में और कुछ न रहे याद पर उनका , हर वक़्त जेह्नो दिल में बराबर ख़याल है ॥ ( वज़्नी ज़ईफ़ी =भारी बुढ़ापा ,मलाल =दुःख...Read more