मेरा मुखड़ा चाँद का टुकड़ा नहीं पर इसमें क्षण-क्षण ॥

देखूँ जब दिखलाए मुझको अक्स में मेरे अकर्षण ॥

इसलिए तो सच्चे जग में प्राणप्रिय मुझको लगे ये ,

मेरा धुँधला-टूटा-झूठा-चापलूसी करता दर्पण ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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