घोर पतझड़ में भी वह क्यों खिल रहा है दोस्तों ?

क्या उसे अभिवांछित सब मिल रहा है दोस्तों ?

हो गया वह आज कैसे संगमरमर का महल ?

जो कि कल तक माँद या इक बिल रहा है दोस्तों !!

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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