कुछ ऐसा जो कभी किसी ने नहीं लिखा –

मुझको वह सब स्वर्ण-अक्षरों में लिखना है ॥

नोचूँगा मुखड़ों से मुखौटे हो निशंक ,निर्भय ।

खोलूँगा सब पोल प्राण हो जाएँ चाहे क्षय ।

सच कहने के दुष्परिणाम से से बचने वालों को ।

झूठ बोलकर लाभ प्राप्ति कर नचने वालों को ।

जो अब तक भी कभी किसी ने नहीं कहा –

मुझको चिल्ला-चिल्ला कर वह सब कहना है ॥

जब हम उनको पूजा करते या लतियाते हैं ।

कहते हैं निष्प्राण मूक पत्थर बतियाते हैं ।

यह घटना प्रायः होती कम या अति चुनी हुई ।

मुझसे भी जाने अनजाने यह अनसुनी हुई ।

मेरे कानों ने जो जो भी नहीं सुना –

मुझको ध्यान लगाकर वह सब कुछ सुनना है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *