क़िला किसी को , किसी को मैं महल कहता हूँ ।।

किसी को चाँद , किसी रुख़ को कमल कहता हूँ ।।

सुने न ग़ौर से अल्फ़ाज़ मेरे , कान उनके 

बड़े ही शौक़ से फिर भी मैं ग़ज़ल कहता हूँ ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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