मुक्तक : 721 – क़ाफ़िला-दर-क़ाफ़िला ॥

रंगीं-महफ़िल , लाव-लश्कर , क़ाफ़िला-दर-क़ाफ़िला ॥ इसमें क्या शक़ मैंने जो चाहा मुझे अक्सर मिला ॥ फिर भी मेरी अपनी भरसक कोशिशों का तो नहीं , मुझको लगता है कि बस क़िस्मत का ही है यह सिला ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 720 – रीते पड़े यहाँ मन ॥

जाने कितनी ही भर्तियाँ होती हैं सन-दर-सन ? भाँति-भाँति की रिक्तियों के होते विज्ञापन ।। क्यों किसी का भी ध्यान जाता ही नहीं इस ओर ? जाने कबसे तो , कितने ही रीते पड़े याँ मन ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 719 – आँच से अंगार

धैर्य – करि , बन मत्त दादुर-दल उछल बैठे ॥ स्निग्ध-पथ पर नोक-डग कल चल फिसल बैठे ॥ बिन छुए तुझको तेरी बस आँच से अंगार , कितने लोहे मोम-सदृश गल-पिघल बैठे ॥ ( धैर्य-करि=संयम के हाथी,मत्त=मतवाला,दादुर-दल=मेंढक समूह,स्निग्ध-पथ=चिकनी राह ,नोक-डग=नुकीले क़दम ) -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 719 – आँच से अंगार

धैर्य-करि , बन मत्त दादुर-दल उछल बैठे ॥ स्निग्ध-पथ पर नोक-डग कल चल फिसल बैठे ॥ बिन छुए तुझको तेरी बस आँच से अंगार , कितने लोहे मोम-सदृश गल-पिघल बैठे ॥ ( धैर्य-करि=संयम के हाथी,मत्त=मतवाला,दादुर-दल=मेंढक समूह,स्निग्ध-पथ=चिकनी राह ,नोक-डग=नुकीले क़दम )...Read more

164 : ग़ज़ल – जी रहा हूँ ॥

ज़ख़्म ख़ुद कर-कर उन्हे ख़ुद सी रहा हूँ ।। अश्क़ का दर्या बहा फिर पी रहा हूँ ।।1।। कुछ न पूछो हो गया क्यों छाछ से बद ? मैं जो उम्दा से भी उम्दा घी रहा हूँ ।।2।। उनकी नज़रों...Read more

मुक्तक : 718 – बेसबब ही

निगाहों में लिए फिरते हैं उसकी शक़्ल यारों ।। नहीं करती हमारी काम कुछ भी अक़्ल यारों ।। किया जिस दिन से उसने बेसबब ही हमको अपने – पकड़ के दिल में कुछ दिन रख के फिर बेदख़्ल यारों ।। – डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more