मुक्तक : 725 – दुश्मन को मैंने

इक ही न बार बल्कि बार-बार किया है ॥ यूँ ही नहीं हमेशा यादगार किया है ॥ मत कोई मेरी बात पर यक़ीन करे पर , दुश्मन को मैंने अपने सच ही प्यार किया है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 724 – दो ग़ज़ ज़मीन

दो ग़ज़ ज़मीन अपने दफ़्न को क्या माँग ली ? पैरों तले कि भी ज़मीन उसने खींच ली !! मेरे ही हक़ को मार के वो शाह हो गया , मैं बेतरह पुकारता रहा अली-अली ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

165 : ग़ज़ल – ज़िंदगी तेरे बिना भी

ज़िंदगी तेरे बिना भी जान चलती ही रही ॥ हाँ कमी बेशक़ तेरी हर आन खलती ही रही ॥ चाहकर भी मैं नहीं तेरे मुताबिक़ बन सका , तू मेरे साँचे में अनचाहे ही ढलती ही रही ॥ होके पानी...Read more

मुक्तक : 723 – मन से बच्चा लाओ तुम ॥

अक़्ल का चाहो भले भरपूर कच्चा लाओ तुम ॥ लाख बूढ़ा ही सही पर मन से बच्चा लाओ तुम ॥ ढूँढता फिरता हूँ मैं इक आदमी यदि हो कहीं – छल-रहित ,पाखण्ड-च्युत ,सोने सा सच्चा लाओ तुम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 722 – सर से न ताज गिरा ॥

कल गिरा देना मगर कम से कम न आज गिरा ॥ ऐ ख़ुदा मुझपे रहम कर न ऐसी गाज गिरा ॥ जान को दाँव पे मैंने लगा जो पाया अभी , जान ले ले तू मेरे सर से वो न ताज गिरा ॥ -डॉ. हीरालाल...Read more