मुक्तक : 738 – तुम मर चुके हो ॥

कुछ ऐसा मेरे दिल पे अपना क़ब्ज़ा कर चुके हो ॥ यूँ ख़्वाबों में , ख़यालों में लबालब भर चुके हो ॥ ज़माना कह रहा है तुम ज़माने में नहीं अब, यकीं मुझको नहीं आता मगर तुम मर चुके हो ॥ -डॉ....Read more

मुक्तक : 737 – बरगद के झाड़ ॥

दुनिया के कैसे-कैसे झाड़ी-झंखाड़ ? कहलाते शीशम-पीपल-बरगद के झाड़ ॥ करके दूबाकार कुछ इक बौनी रचनाएँ , विज्ञापन में उनको दिखला-दिखला ताड़ !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 736 – आँखें नहीं माँगूँ ?

मुझे लाज़िम नहीं इक शम्अ , हरगिज़ भी न इक जुगनूँ  ? मैं अंधा हो के भी क्यों भीख में आँखें नहीं माँगूँ  ? तो सुन – दिन-रात याँ रहती हुक़ूमत सिर्फ़ अँधेरों की , मना है देखने की बात भी करना , न है मौजूँ  !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 735 – है युवा पुरुषार्थ कर

हर घड़ी आलस्य में पड़ लेट कर ।। मत बढ़ा चर्बी बड़ा मत पेट कर ।। है युवा पुरुषार्थ कर भरसक अरे , सो के जीवन को न मटिया मेट कर ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 734 – ज़िंदगी यह मौत सी

सिर्फ़ दो या चार ही दम को मिली ॥ उसपे तुर्रा यह फ़क़त ग़म को मिली ॥ किस सज़ा को उस ख़ुदा से इस क़दर , ज़िंदगी यह मौत सी हमको मिली ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 733 – उसका अर्मान था

( चित्र Google Search से साभार ) उसका बेशक़ मैं कभी भी नहीं हबीब रहा ।। उसके दिल ही के न घर के कभी क़रीब रहा ।। उसका अर्मांं था मैं कातिब अमीर होता बड़ा , मेरी क़िस्मत ! मैं हमेशा...Read more