हल्दी से पीले तुमको कैसे मैं हरा लिखूँ ?

हो रिक्त तुम तो क्यों तुम्हें भरा-भरा लिखूँ ?

विधिवत् तुम्हारी साँसे चल रही हैं , है पता

कुछ बात है मैं तुमको अनवरत मरा लिखूँ !

क्या इसलिए कि तुम प्रगाढ़ मित्र हो मेरे ,

पीतल को भी तुम्हारे स्वर्ण मैं खरा लिखूँ ?

उत्साह ,शक्ति ,स्वप्न और त्वरा से हीन जो

यौवन हो ,कैसे मैं उसे नहीं जरा लिखूँ ?

धंधा तुम्हारा जब रुदन-विलाप का ही है ,

सर्कस का तुमको फिर मैं कैसे मस्ख़रा लिखूँ ?

सच बोलने का दृढ़प्रतिज्ञ हूँ अतः सदा

चोली को चोली ,घाघरे को घाघरा लिखूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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