लम्हा भर भी न मुझे जिसने मोहब्बत की थी ,

मैंने उसकी ही शबोरोज़ इबादत की थी !!

बेनसीबी का फ़साना मैं कहूँ क्या अपनी ?

मुझसे अपनों ने सरेआम बग़ावत की थी !!

मानता क्या मैं बुरा यारों की बातों का , हाँ ?

मैंने भूले न अदू की भी शिकायत की थी !!

जिसका दुनिया में कहीं कोई तरफ़दार न था ,

सिर्फ़ मैंने न कभी उसकी ख़िलाफ़त की थी ॥

उसने बख़्शा न मुझे एक ख़ता पर जिसके ,

मैंने कितने ही गुनाहों पे रिआयत की थी ॥

टूट और फूट गया वो भी बुरा ही आख़िर ,

मैंने जाँ से भी अधिक जिसकी हिफ़ाज़त की थी ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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