( चित्र Google Search से साभार )

बिन्दु को जिसने हज़ारों बार सिन्धु समझ लिया ;

सिन्धु को क्या सोच अनगिन बार बिन्दु समझ लिया ?

भूल हमने क्यों यही की बार-बार उसके लिए ,

ना समझना था समझदार उसको किन्तु समझ लिया ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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