कविता : विश्वसुंदर

उस घर में संसार भर में दूसरा कोई इससे अधिक किन्तु विश्वसुंदर अतुल्य फूल नहीं खिला किन्तु मैं आतुर हूँ  उसकी तुलना करने को  अतः अनवरत सोच में पड़ा हूँ कि किसकी उपमा दूँ उसे चाँद , सूरज या अन्य कोई और और तभी...Read more

मुक्तक : 759 – संदल बना दो तुम ॥

[ चित्रांकन :डॉ. हीरालाल प्रजापति ] सुलगता मन-मरुस्थल इक हरा जंगल बना दो तुम ॥ नुकीली नागफणियाँ फूलते संदल बना दो तुम ॥ ठिठुरते-काँपते , नंगे-धड़ंगे मेरे जीवन का , तुम्हारा गर्म–ऊनी प्यार अब कंबल बना दो तुम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 758 – फ़िक्र अगर होती ॥

तुझको मेरे दर्द की सच फ़िक्र अगर होती ॥ ना सही पूरी ज़रा सी ही मगर होती ॥ है अभी तक बेअसर मुझ पर दवा जो वो , तू पिलाती तो यक़ीनन कारगर होती ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 757 – कोहे नूर था ॥

दिन-रात अपनी आँखों के वो हुजूर था ॥ ना जाने क्यों समझ से बाहर था दूर था ? कंकड़ ही जान हमने ठुकरा दिया उसे , कुछ और वो नहीं था , इक कोहे नूर था ॥ (हुजूर =सामने, कोहे नूर =कोहिनूर हीरा )...Read more

मुक्तक : 755 – बारात में हूँ मैं !!

तुम न जानोगे कि किन हालात में हूँ मैं ? गिन नहीं पाओगे जिन आफ़ात में हूँ मैं !! चल रहा हूँ जिस तरह से तुम न समझोगे , हूँ जनाज़े में या फ़िर बारात में हूँ मैं !! (हालात=परिस्थितियाँ...Read more