[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ] 

न सचमुच जहाँ के तहीं चाहता हूँ ॥

कहीं और भी मैं नहीं चाहता हूँ ॥

न जन्नत न दोज़ख में रहने की ख़्वाहिश ,

जहाँ वो रहें घर वहीं चाहता हूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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