कसमसा के तिलमिला के फड़फड़ा के रह गए ॥

लाज से धरती में सर अपना गड़ा के रह गए ॥

स्वप्न निशिदिन जिसको चित करने का तकते थे सदा ,

धूल उससे चाटकर कपड़े झड़ा के रह गए ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *