इस हेतु कि

हमें देखकर कोई धोखा न खा सके

परम आवश्यक हैं……

ऐसे संकेत ,ऐसे प्रतीक

जो अवगत करा सकें हमारे दर्शनार्थी को

हमारी वास्तविकता अथवा सच्चाई से

कि हम जो अंदर से भेड़िये हैं

ओढ़े भले ही हैं गाय का खोल

ऊपर से भी भेड़िया ही लगें ।।

क्योंकि तथाकथित व्यक्तित्व-विकास की

कक्षाओं में जा जाकर

सर्वथा ओढ़ी हुई

आकर्षक व्यावहारिक कृत्रिमताओं  से

हम कुशल अभिनेता हो चुके हैं  ,

क्योंकि शर्मनाक है रोना अतः

बाहर बात-बेबात ठहाका लगा रहे हैं हम

अंदर से सुबकते हुए ।।

चूँकि नुकसान हो सकता है अथवा

पीटे जा सकते हैं

अतः वाणी से स्तुतिगान कर रहे हैं

मन में अश्लीलतम गालियाँ बकते हुए ।।

साहूकार बनकर ठगना आसान है ,

बाँये हाथ का खेल होता जा रहा है

मित्र बनकर छलना ।।

कैसे-कैसे विरोधाभास सर्वत्र फैले हैं ?

हर तरफ भ्रम ही भ्रम ,

छलावा ही छलावा ,

मुखौटे ही मुखौटे ,

अभिनय ही अभिनय ।।

हमारे क्रूर जानलेवा शत्रु

सूरत से भोले , सुंदर और प्यारे हैं ।।

भीतर से लिजलिजे , पिलपिले

ऊपर से सर्वमान्य लौह पुरुष बने फिरते हैं ।।

मधुर संगीतमयी हैं झूठों कि बकवासें ,

सत्य के स्वर कर्णकटु अथवा जहरीले हैं ।।

नामर्द

घरवालियों को बाँझ कह-कह कर ठोंक-पीट रहे हैं ,

अय्याश चोला ओढ़े बैठे हैं ब्रह्मचारी का ।।

और भी न जाने क्या-क्या ?

कुल मिलकर धोखाधड़ी से बचने-बचाने

सुहागन के सिंदूर ,मंगलसूत्र ,बिछिया जैसे ,

अगर सुन सको तो सुनो –

नीति-नियामकों-निर्धारकों

हम असली हैं या नकली

यह सामने वाला सरलता से समझ सके ऐसे

ऊपरी पहचान चिह्न निर्मित करने ही होंगे ।।

  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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