[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

हौले – हौले नींद से जैसे जगाती हैं ॥

जानता हूँ वो मुझे ही तो बुलाती हैं ॥

पंख होते तो मैं फ़ौरन ही न सुन लेता ,

आस्माँ से जो सदाएँ रोज़ आतीं हैं ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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