[ चित्रांकन :डॉ. हीरालाल प्रजापति ]

सुलगता मन-मरुस्थल इक हरा जंगल बना दो तुम ।।

नुकीली नागफणियाँ फूलते संदल बना दो तुम ।।

ठिठुरते-काँपते , नंगे-धड़ंगे मेरे जीवन का ,

तुम्हारा गर्म ऊनी प्यार अब कंबल बना दो तुम ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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