मुक्तक : 767 – हिरन को हरा दूँ ॥

तेरे लिए निचोड़ तप्त रेत बता दूँ ॥ तू कह तो बर्फ जल को लंक जस ही जला दूँ ॥ हो जाए आज भी तू मेरी तो मैं क़सम से , लँगड़ा हूँ फिर भी दौड़कर हिरन को हरा दूँ ॥...Read more

मुक्तक : 766 ( B ) अब पस्त हो बैठे ?

तेरे भी बाक़ी बचे सब पस्त हो बैठे ॥ मेरे तो मत पूछ तू कब पस्त हो बैठे ? जो बँधाते थे हमें हिम्मत ये हैरत है – उनके भी सब हौसले अब पस्त हो बैठे ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 766 – छुरी वो निकली ॥

सचमुच बहुत बुरी वो , निकली तो अब करें क्या ? जल नाँँह माधुरी वो , निकली तो अब करें क्या ? सोचा था पुष्प कोमल , कोमल है वो अरे पर , काँटा , छुरा , छुरी वो , निकली तो...Read more

मुक्तक : 765 – वो क्या मुझे जगाएगा ?

( चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ) वो क्या मुझे जगाएगा जो ख़ुद ही सो रहा ? वो क्या मुझे हँसाएगा जो ख़ुद ही रो रहा ? हिम्मत-ओ-हौसला वो क्या दिलाएगा मुझे , जो ख़ुद हिरास में है लस्त-पस्त हो रहा ? ( हिरास...Read more

मुक्तक : 764 – ज़िंदगी करती रही

[ चित्रांकन : डॉ. हीरालाल प्रजापति ] ज़िंदगी करती रही अपनी फ़ज़ीहत रोज़ ही ॥ और हम लेते रहे उससे नसीहत रोज़ ही ॥ रोज़ ही फँसते रहे हम हादसों में और फिर , शर्तिया होती रही उनसे फ़राग़त रोज़ ही...Read more

मुक्तक : 763 – एक ही मक़्सद

ज़िंदगी का एक ही मक़्सद रखा ले लूँ मज़ा ॥ जिस तरह भी बन पड़े कर लूँ हर इक पूरी रज़ा ॥ लेकिन इस तक़्दीर ने भी ठान रक्खी थी अरे , वो इनामों की जगह देती रही चुन-चुन सज़ा...Read more