मुक्तक : 776 – दलदल में धँस रहा ॥

वो जानबूझ कर ही तो दलदल में धँस रहा ॥ मर्ज़ी से अपनी काँटों के जंगल में फँस रहा ॥ इस धँसने और फँसने से होगा ज़रूर उसे , कुछ फ़ायदा ही दर्द में वो तब तो हँस रहा ॥...Read more

मुक्तक : 775 – चूहे की दुम

कर दोगे मुँह से शेर के चूहे की दुम उसे ॥ होशो-हवास लूट के कर दोगे गुम उसे ॥ इक बार सिर्फ़ोसिर्फ़ हाँ बस एक बार ही , दिखला दो अपना हुस्न जो बेपर्दा तुम उसे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

गीत : 38 – सुए से फोड़ लें आँखें ?

जो पढ़ना चाहते हैं वैसा क्यों लिखता नहीं कोई ? जो तकना चाहते हैं वैसा क्यों दिखता नहीं कोई ? कि पढ़ना छोड़ ही दें या सुए से फोड़ लें आँखें ? कोई अपनों में दिखता ही नहीं मन मोहने वाला , कोई मिलता...Read more

मुक्तक : 774 – राह के क़ालीन

आशिक़ो-महबूब भी फटके न फिर उसके क़रीब ॥ हो गया जब शाह से वह माँगता-फिरता ग़रीब ॥ जो हुआ करते थे उसकी राह के क़ालीन सब , वक़्ते-आख़िर पास में उसके न दिक्खे वो हबीब ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 773 – साफ़-सुथरे ख़्वाब

सुधारता रहूँगा भूल पर मैं भूल अपनी ॥ न पड़ने दूँगा आँख में घुमड़ती धूल अपनी ॥ रखूँगा साफ़-सुथरे ख़्वाब अपने मैं ज़िंदा , न होने दूँगा हसरतें कभी फिज़ूल अपनी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

मुक्तक : 772 – अति लघुकथा

अति लघुकथा विशाल उपन्यास बन गई ।। कविता महान काव्य अनायास बन गई ।। अभिलाष सत्य तृप्ति का था एक बूँद से , तृष्णा अथाह किंतु मृगी-प्यास बन गई !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more