जो पढ़ना चाहते हैं वैसा क्यों लिखता नहीं कोई ?

जो तकना चाहते हैं वैसा क्यों दिखता नहीं कोई ?

कि पढ़ना छोड़ ही दें या सुए से फोड़ लें आँखें ?

कोई अपनों में दिखता ही नहीं मन मोहने वाला ,

कोई मिलता नहीं पूरा हृदय को सोहने वाला ,

करें क्या शत्रु को मन भेंट दे दें , जोड़ लें आँखें ?

नहीं लगता असाधारण हमें क्यों उसका अब व्यक्तित्व ?

कड़ा संघर्ष कर स्थापित किया जिस पर था कल स्वामित्व ,

दरस को जिसके मरते थे लगे अब मोड़ लें आँखें ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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