मुक्तक : 783 – दो ख़बर ॥

झूठ है , झूठ है , झूठ है हाँ मगर ॥ दोस्तों-दुश्मनों सबको कर दो ख़बर ॥ कम से कम मुंतज़िर मेरी मैयत के जो , उनसे कह दो कि मैं कल गया रात मर ॥ ( मुंतज़िर = प्रतीक्षारत , मैयत = मृत्यु ) -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

गीत : 40 – अलाव नहीं है ॥

चाहे धरा पे चाहे चाँद पे या अधर पर ॥ जो चाहते हैं वह न लाके दोगे तुम अगर ॥ तुम लाख कहो तुमको हमसे प्यार है मगर , हम समझेंगे हमसे तुम्हें लगाव नहीं है ॥ सिंगारहीन हमको देखकर अगर...Read more

मुक्तक : 782 – चने नहीं चबाना है ॥

लाल मिर्ची औ’ बस चने नहीं चबाना है ॥ सोने – चाँदी के पेट भरके कौर खाना है ॥ आज रहता हूँ झोपड़ी में मैंं मगर ब ख़ुदा , मुझको अपने लिए कल इक महल बनाना है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्तक : 781 – मोहब्बत , इश्क़, मह्वीयत

भले नाकाम लेकिन तह-ए-दिल से करना हर कोशिश ॥ जिसे पाना न हो मुमकिन उसी की पालना ख़्वाहिश ॥ इसे तुम चाहे जो समझो मोहब्बत , इश्क़, मह्वीयत , मेरी नज़रों में है ये ख़ुद की ख़ुद से बेतरह रंजिश ॥ ( ख़्वाहिश =इच्छा ,मोहब्बत , इश्क़...Read more

172 : ग़ज़ल – क़ातिल से मिलते हैं !!

मुसाफ़िर सारे के सारे कहाँ मंज़िल से मिलते हैं ? सफ़ीने सब के सब कब वक़्त पे साहिल से मिलते हैं ? मिला करते हैं लग-लग के गले भी लोग और कस-कस , मिलाते हाथ भी हैं सच मगर कब...Read more

गीत : 39 – चिथड़े-चिथड़े, टुकड़े-टुकड़े

पूर्णतः था जिसपे मैं दिन – रात निर्भर ॥ आज अचानक दिल के दौरे से गया मर ॥ उसको मैं क्योंकर न धोख़ेबाज़ बोलूँ ? माँगता था उससे मैं जब कुछ कि यह दो । जितना जी चाहे वो कहता था...Read more