ज़रा सी बाढ़ को तुम यों ही ज़लज़ला न कहो ॥

दिये की लौ है इसे सूर्य-चंद्रमा न कहो ॥

जो जी में आए ख़ुशामद में याद करके कहें ,

मगर हाँ भूल के नाली को नर्मदा न कहो ॥

न पहुँचे लाख वो मंज़िल पे पर चला जो चले ,

उसे कभी भी पड़ा , ठहरा या खड़ा न कहो ॥

अभी वो शेर का शावक है दंतहीन मगर ,

गले लगा के उसे गाय का बछड़ा न कहो ॥

ये माना कब से वो खटिया पे शव के जैसा पड़ा ,

कि साँस चलती है जब तक उसे मरा न कहो ॥

ज़माना जिसको कि इक सुर में कह रहा हो भला ,

भले बुरा हो वो पर उसको तुम बुरा न कहो ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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