पैर धरती पे देखो रखे बिन चली ॥

दुनिया सारी मनाने को दीपावली ॥

कानफोड़ू पटाखों की चहूँदिस धमक ।

जलती बारूद की सूर्य जैसी चमक ।

बूढ़े , शिशु और बीमार इस शोर से ,

जब दहलते हैं भीतर से उठते बमक ।

पूछते हैं धमाकों का औचित्य वो –

जो मचा देता है शांति में खलबली ?

पैर धरती पे देखो रखे बिन चली ॥

दुनिया सारी मनाने को दीपावली ॥

तेल खाने नहीं पर जलाने बहुत ।

ज़ीरो पढ़ने नहीं जगमगाने बहुत ।

सौ के बदले जलाओ दिया एक ही ,

बल्ब इक रोशनी में नहाने बहुत ।

सोचना फिर तुम्हीं तेल कितना बचा ?

एक ही रात में कितनी बिजली जली ?

पैर धरती पे देखो रखे बिन चली ॥

दुनिया सारी मनाने को दीपावली ॥

( ज़ीरो = ज़ीरो बल्ब , बमक = चौंक पड़ना , सहम जाना )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *