चाहे धरा पे चाहे चाँद पे या अधर पर ॥

जो चाहते हैं वह न लाके दोगे तुम अगर ॥

तुम लाख कहो तुमको हमसे प्यार है मगर ,

हम समझेंगे हमसे तुम्हें लगाव नहीं है ॥

सिंगारहीन हमको देखकर अगर तुम्हें –

ऐसा लगे न सामने है कोई अप्सरा ।

सजधज के आएँ तो लगे न दिल की धड़कनें –

थम सी गई हैं या तुरंत बढ़ गईं ज़रा ।

हम मान लेंगे हममें सुंदराई तो है पर ,

टुक चुम्बकत्व या तनिक खिंचाव नहीं है ॥

छू भर दें हम अगर तुम्हें तो तुमको न लगे –

बहने लगी नसों में ख़ून की जगह पे आग ।

धर दें अधर अधर पे फिर भी तुममें रंच भी –

जो सुप्त है कि मृत है वो जाए न काम जाग ।

समझेंगे अपना व्यर्थ है यौवन ये सरासर ,

ठंडा है दहकता हुआ अलाव नहीं है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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