दुश्मन दो मुझको जानी या जानी फिर बलम दो ॥

जज़्बात को दिखाने खुशियाँ या कुछ अलम दो ॥

पानी पे कैसे मुमकिन कुछ भी उकेरना हो ?

इक मुझको कोरा काग़ज़ ,अच्छी सी इक क़लम दो ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *