मेरे प्रति निर्मम है अति निष्ठुर है तू ॥

शत्रुओं से प्रेम को आतुर है तू ॥

आदमी सा तू कभी चलता नहीं ,

साँप है या फिर कोई दादुर है तू ?

जब पड़े तू पंखुड़ी पर दे कुचल ,

ओस है या साँड़नी का खुर है तू ॥

चाहता कोई न क्यों सुनना तुझे ,

काक-वाणी है या खर का सुर है तू ?

मत स्वयं को माँग का सिंदूर कह ,

पाँव का आरक्त द्रव माहुर है तू ॥

हथकड़ी या पाँव की बेड़ी है रे ,

तू न मंगलसूत्र है नाँँ दुर है तू ॥

और सब बातों में तू कच्चा बड़ा ,

किन्तु अपने निर्णयों में धुर है तू ॥

( दादुर=मेंढक ,खुर=चौपायों के पाँव के निचले भाग का खोल या नाखून ,खर=गधा ,माहुर=आलता ,दुर=नाक या कान की मोती युक्त लटकन ,धुर=पक्का )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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