उजड़े-उजड़े रहे कब बहार हम रहे ?

इसलिए हम न गुल सिर्फ़ ख़ार हम रहे ॥

तुम कुम्हार हो के भी ज़र के ज़ेवर रहे ,

बनके माटी के लौंदे सुनार हम रहे ॥

ख़ुद पे भी एतबार अब हमें सच नहीं ,

इतने धोख़ाधड़ी के शिकार हम रहे ॥

मक़्बरा भी हो तो क्या है तुम ताज हो ,

हो के मस्जिद भी उजड़ी मज़ार हम रहे ॥

तुम हवाई जहाजों पे उड़ते चले ,

रात-दिन बस गधों पे सवार हम रहे ॥

तुम रहे ख़ुशनसीबी से मंज़िल सदा ,

अपनी कमबख़्ती से रहगुज़ार हम रहे ॥

(गुल=पुष्प ,ख़ार=काँटा ,ज़र=स्वर्ण ,ज़ेवर=आभूषण ,एतबार=विश्वास ,कमबख़्ती=दुर्भाग्य )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *