थमतीं न थीं इक ठौर पे रहतीं थीं जो चंचल ॥

नदियों सी इठलाती चला करती थीं जो कलकल ॥

क्या हो गया गहरी भरी वो झील के जैसी ,

आँखे वो बनकर रह गईं क्यों थार का मरुथल ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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