ग़ज़ल : 221 – तुझमें ज़िद आर्ज़ू की

उम्र ढलती है मेरी तो ढलती रहे ।। हाँ जवानी तुम्हारी सँभलती रहे ।।1।। अपनी सब हसरतें मैं मनालूँ अगर , तुझमें ज़िद आर्ज़ू की मचलती रहे ।।2।। मौत जब तक न आए फ़क़त ज़िंदगी , पाँव बिन भी ग़ज़ब...Read more

ग़ज़ल : 220 – शर्म बैठी है पर्दों में

जैसे ख़ुशबू गुलाबों में भी ना दिखे ।। उनको नश्शा शराबों में भी ना दिखे ।।1।। उस हसीं चश्म को भी मैं अंधा कहूँ , हुस्न जिसको गुलाबों में भी ना दिखे ।।2।। बदनसीब इस क़दर कौन होगा भला ,...Read more

ग़ज़ल : 219 – खा-खा कर ॥

अपनों से बैठे खफ़ा हैं खार खा-खा कर ।। घूँट पीते ख़ून का खूंख़्वार खा-खा कर ।।1।। बेबसी में जो न खाना था वही जाँ को ; हम बचाते पड़ गए बीमार खा-खा कर ।।2।। इस क़दर मज़्बूर हैं हम...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 866 – ये तेरा जिस्म

तू सिर से पाँव तक बेशक निहायत खूबसूरत है ॥ ये तेरा जिस्म संगेमरमरी कुदरत की मूरत है ॥  नहीं बस नौजवानों की , जईफ़ों की भी अनगिनती ; तू सचमुच मलिका-ए-दिल है , मोहब्बत है , ज़रूरत है ॥ (  जईफ़ों = वृद्धों ) –डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 218 – जंगलों की आग बन जा

उनके दिल में कर न तू बसने की तैयारी ।। उनकी नज़रों में कोई पहले ही है तारी ।।1।। जंगलों की आग बन जा या तू बड़वानल , वो तुझे समझेंगे फिर भी सिर्फ़ चिंगारी ।।2।। इससे बचके रहना ही...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 865 – उन आँखों पे पड़ी नक़ाबें हैं ॥

पढ़ो तो फ़लसफे की दो अहम किताबें हैं ॥ जो पी सको तो ये न आब ; ये शराबें हैं ॥ मगर क़िले के बंद सद्र दर सी पलकों की ; अभी बड़ी उन आँखों पे पड़ी नक़ाबें हैं ॥ ( फ़लसफ़ा =...Read more