मुक्तक : 802 – नग्नाटक ॥

दे चुका जीवन का मैं हर मूल्य हर भाटक ॥ जबकि मुझ पर खुल रहा अब मृत्यु का फाटक ॥ वस्त्र – आभूषण से रहता था लदा कल तक , आज गलियों में मैं घूमूँ बनके नग्नाटक ॥ ( भाटक =किराया...Read more

मुक्तक : 800 – ठंडों में गरम कम्बल देना ॥

जब प्यास से गर्मी में तड़पूँ , तब शीतल-शीतल जल देना ॥ तुम भेंट के इच्छुक हो तो मुझे , ठंडों में गरम कम्बल देना ॥ उपहार वही मन भाता है जो , हमको आवश्यक होता है ; अतएव मेरी तुम चाह समझ –...Read more

गीत : 41 – मैं क्यों कवि बन बैठा ?

कई प्रश्न स्वयं के अनुत्तरित – इक यह कि मैं क्यों कवि बन बैठा ? बाहर चहुँँदिस वह चकाचौंध । आकाश-तड़ित सी महाकौंध । प्रत्येक उजालों का रागी , जुगनूँ तक पे सब रहे औंध । यद्यपि मैं पुजारी था तम का ,...Read more

मुक्तक : 799 – क़िस्मत छलेगी प्रिये ॥

आज फिर मुझको क़िस्मत छलेगी प्रिये ॥ शुष्क वस्त्रों को गीला करेगी प्रिये ॥ भूल मैं जो गया आज छतरी कहीं , आज बरसात होकर रहेगी प्रिये ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 179 – पिलाने का हुनर ॥

प्यास को पानी बिना हमने बुझाने का हुनर ॥ ग़मज़दा रह-रह के सीखा मुस्कुराने का हुनर ॥ पाके खो देने के फ़न में सब ही हैं माहिर यहाँ , इश्क़ ने हमको बताया खो के पाने का हुनर ॥ सब...Read more

मुक्तक : 798 – कौआ समझते थे ॥

चंद्रमा को एक जुगनूँ सा समझते थे ॥ श्वेतवर्णी हंस को भँवरा समझते थे ॥ आज जाना जब हुआ वो दूर हमसे सच , स्वर्ण-मृग को हम गधे ; कौआ समझते थे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more