चंद्रमा को एक जुगनूँ सा समझते थे ॥

श्वेतवर्णी हंस को भँवरा समझते थे ॥

आज जाना जब हुआ वो दूर हमसे सच ,

स्वर्ण-मृग को हम गधे ; कौआ समझते थे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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