प्यास को पानी बिना हमने बुझाने का हुनर ॥

ग़मज़दा रह-रह के सीखा मुस्कुराने का हुनर ॥

पाके खो देने के फ़न में सब ही हैं माहिर यहाँ ,

इश्क़ ने हमको बताया खो के पाने का हुनर ॥

सब ही पीते हैं शराबें ढालकर इक जाम में ,

उसने आँखों से दिखाया है पिलाने का हुनर ॥

सब कमाना चाहते हैं हाँ मगर अफ़्सोस ये ,

सब को कब आता है दुनिया में कमाने का हुनर ?

मत कुछ ऐसा कर कि अपने मानकर चल दें बुरा ,

रूठना आसाँ है मुश्किल है मनाने का हुनर ॥

अब मोहब्बत की तिजारत में है लाज़िम सीखना ,

बेवफ़ाओं को तहेदिल से भुलाने का हुनर ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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